Pushpalata Vlogs

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रमेश की जिंदगी कभी बहुत साधारण थी। एक छोटी-सी नौकरी, किराए का घर और परिवार के साथ छोटी-सी खुशियाँ—उसे लगता था कि जिंदगी ...
23/08/2026

रमेश की जिंदगी कभी बहुत साधारण थी। एक छोटी-सी नौकरी, किराए का घर और परिवार के साथ छोटी-सी खुशियाँ—उसे लगता था कि जिंदगी भले ही मुश्किल है, लेकिन चल रही है।

फिर अचानक जैसे उसकी किस्मत ने करवट ले ली।

सबसे पहले उसकी नौकरी चली गई। उसने सोचा, “कोई बात नहीं, मेहनत करूंगा तो दूसरी नौकरी मिल जाएगी।” लेकिन कई महीनों तक कोशिश करने के बाद भी उसे काम नहीं मिला।

घर का किराया बाकी हो गया। राशन खत्म होने लगा। पत्नी की आँखों में चिंता और बच्चों की आँखों में भूख साफ दिखाई देने लगी।

एक दिन पत्नी ने धीरे से कहा,
“घर में बस इतना आटा बचा है कि आज रात की रोटी बन सके।”

रमेश ने कुछ नहीं कहा। वह बाहर चला गया ताकि उसके आँसू कोई देख न सके।

उसे लगा भगवान ने उसकी परीक्षा लेना शुरू कर दिया है।

लेकिन मुसीबतें यहीं नहीं रुकीं।

कुछ ही दिनों बाद उसकी पत्नी बीमार पड़ गई। इलाज के लिए पैसे चाहिए थे, लेकिन जेब बिल्कुल खाली थी। जिन दोस्तों के लिए रमेश ने कभी अपनी जरूरतें छोड़कर मदद की थी, आज उन्हीं में से किसी ने उसका फोन नहीं उठाया।

जिस रिश्तेदार को उसने कभी मुश्किल समय में पैसे दिए थे, उसने भी साफ कह दिया,
“भाई, अभी मेरे अपने खर्चे बहुत हैं।”

रमेश उस रात मंदिर की सीढ़ियों पर जाकर बैठ गया।

आँखों से आँसू बह रहे थे।

उसने भगवान की मूर्ति की तरफ देखकर कहा—

“हे भगवान… आखिर मुझसे क्या गलती हो गई?
नौकरी छीन ली, पैसे छीन लिए, अपनों का साथ छीन लिया… अब क्या बाकी है?”

वह बहुत देर तक रोता रहा।

फिर उसने हाथ जोड़कर कहा—

“अगर मेरी परीक्षा ले रहे हो तो मुझे इतनी ताकत देना कि मैं टूटकर भी हार न मानूँ।”

अगली सुबह रमेश घर लौट आया।

उसके पास पैसे नहीं थे, लेकिन दिल में एक छोटी-सी उम्मीद थी।

उसी दिन रास्ते में उसे एक बुजुर्ग आदमी मिले। उनके हाथ में सब्जियों की छोटी-सी टोकरी थी। बुजुर्ग ने रमेश से पूछा—

“बेटा, तुम इतने परेशान क्यों हो?”

रमेश ने पहले कुछ नहीं कहा। लेकिन शायद उस दिन उसके दिल का बाँध टूट चुका था। उसने अपनी पूरी कहानी बुजुर्ग को बता दी।

बुजुर्ग कुछ देर चुप रहे और फिर बोले—

“बेटा, कभी-कभी भगवान इंसान के हाथ से सब कुछ इसलिए नहीं छीनते कि उसे सजा दें… बल्कि इसलिए कि उसे उन चीजों से दूर कर सकें, जिन पर वह जरूरत से ज्यादा भरोसा करने लगा है।”

उन्होंने अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले और रमेश के हाथ में रख दिए।

रमेश ने कहा,
“बाबा, मैं ये पैसे वापस कर दूँगा।”

बुजुर्ग मुस्कुराए और बोले—

“जब तुम्हारे पास बहुत हो जाए, तब किसी और जरूरतमंद को दे देना। मुझे वापस मत करना।”

रमेश की आँखों में आँसू आ गए।

अगले दिन वही बुजुर्ग उसे एक छोटे व्यापारी के पास ले गए। वहाँ मजदूर की जरूरत थी। रमेश ने काम शुरू कर दिया।

काम छोटा था, लेकिन उसके लिए वह किसी वरदान से कम नहीं था।

धीरे-धीरे उसकी जिंदगी फिर पटरी पर आने लगी।

पत्नी का इलाज हुआ। बच्चों के लिए राशन आने लगा। कुछ महीनों बाद रमेश ने थोड़े पैसे बचाकर अपनी छोटी-सी दुकान शुरू कर ली।

एक साल बाद उसकी दुकान अच्छी चलने लगी।

लेकिन रमेश उस बुजुर्ग को कभी नहीं भूल पाया।

वह उन्हें ढूँढता रहा।

एक दिन आखिरकार उसे पता चला कि वही बुजुर्ग बहुत बीमार हैं। रमेश तुरंत उनके घर पहुँचा और उनकी दवा, इलाज और खाने का पूरा इंतजाम करने लगा।

बुजुर्ग ने कमजोर आवाज में पूछा—

“बेटा, तूने मुझे पहचाना?”

रमेश रोते हुए उनके पैर पकड़कर बोला—

“बाबा, उस दिन आपने मुझे सिर्फ पैसे नहीं दिए थे… आपने मुझे दोबारा जीने की वजह दी थी।”

बुजुर्ग मुस्कुराए और बोले—

“नहीं बेटा… मैंने कुछ नहीं किया था। भगवान ने तुम्हें मेरे पास भेजा था।”

रमेश की आँखों से आँसू निकल पड़े।

उस दिन उसे समझ आया—

कभी-कभी भगवान हमारी जिंदगी को तोड़ते नहीं हैं… वे उसे नए सिरे से बनाने के लिए पुराना सहारा हटा देते हैं।

जिस दिन लगता है कि चारों तरफ से रास्ते बंद हो गए हैं, शायद उसी दिन भगवान हमारे लिए कोई ऐसा रास्ता खोल रहे होते हैं, जिसे हम अपनी परेशानी की वजह से देख नहीं पा रहे होते।

इसलिए अगर आज आपकी जिंदगी में भी सब कुछ बिखर रहा है…

तो हार मत मानिए।

हो सकता है भगवान आपको तोड़ नहीं रहे हों…
बस आपको उस जिंदगी के लिए तैयार कर रहे हों, जिसकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की।

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पूजा मिश्रा ❤️

#कहानी

इस आदमी ने पिछले दस महीनों में खूब मज़े लूटे हैं, अकेले रहकर!  क्योंकि दस महीने मैं मायके में थी और ये जनाब गुरुग्राम मे...
23/08/2026

इस आदमी ने पिछले दस महीनों में खूब मज़े लूटे हैं, अकेले रहकर! क्योंकि दस महीने मैं मायके में थी और ये जनाब गुरुग्राम में आराम से अकेले रह रहे थे। ना बच्चों का रोना-धोना सुनना पड़ा, ना इनकी पॉटी-सूसू साफ करनी पड़ी, ना पूरे दिन गोद में उठाकर घूमना पड़ा, ना खाना खिलाने के पीछे भागना पड़ा… कुल मिलाकर बाप बनने का सिर्फ टाइटल था, ड्यूटी लगभग छुट्टी पर थी। अब दस महीने बाद जैसे ही मैं रावी - रागवी को लेकर गुरुग्राम वापस आई हूँ, दोनों बहनों ने अपने पापा से पिछले दस महीनों का पूरा हिसाब-किताब वसूलना शुरू कर दिया है। जिस दिन ये घर पर होते हैं, पूरे घर में एक ही संगीत बजता है—“पापा… पापा… पापा… पापा…पापा ” अब हालत ये है कि पापा दो मिनट के लिए बाथरूम भी नहीं जा सकता दोनों बहनें गेट पापा... पापा.... पापा... कहते हुए गेट पीटने लगती हैं। पापा को अब समझ आ रहा होगा कि दस महीने की छुट्टी का ब्याज भी देना पड़ता है! दोनों बंदरियाँ पूरे दिन पापा के ऊपर चढ़ी रहती हैं और पापा सोच रहे है— वो मेरी नींद, मेरा चैन मुझे लौटा दो......” लेकिन पुराने दिन पुराने हो गए मिस्टर अब वो वापिस नहीं आएंगे। बट मेरी जुबान पर बार बार ये गाना पता नहीं क्यों आ रहा है......अब जा के आया मेरे बेचैन दिल को करार......😄😄

अपनी कमाई का ज्यादा नही तो दस प्रतिशत अपने शौक पूरे करने पर खर्च करो। गृहस्ती यूँ ही चलती रहेगी। बैंक बैलेंस कितना भी कर...
23/08/2026

अपनी कमाई का ज्यादा नही तो दस प्रतिशत अपने शौक पूरे करने पर खर्च करो। गृहस्ती यूँ ही चलती रहेगी। बैंक बैलेंस कितना भी कर लो। अंत मे औलाद को कम ही लगेगा। यहाँ आप जीने आये हो। सात पीढ़ियों का बन्दोबस्त करने नही आये। थोड़ा सा जी लो। पता नही कब सांस चलनी बन्द हो जाए। याद रखो ये दिन लौट कर कभी नही आयेंगे। उम्र भाग रही है। थोड़े दिन बाद दांत और आंत दोनों जवाब दे देंगे। घूमो, फिरो, खाओ, पियो मस्ती करो।🤩😍

Good morning
23/08/2026

Good morning

पिछले रविवार मैं अचानक बिना बताए अपने मायके पहुँची। शादी के बाद यह पहली बार था जब मैं इस तरह सरप्राइज़ देने घर गई थी। दो...
22/08/2026

पिछले रविवार मैं अचानक बिना बताए अपने मायके पहुँची। शादी के बाद यह पहली बार था जब मैं इस तरह सरप्राइज़ देने घर गई थी। दोपहर का वक्त था, घर का मुख्य दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ था। मैंने बिना आवाज़ किए पैर अंदर रखे, यह सोचकर कि मम्मी-पापा को चौंका दूँगी।
​हॉल में सन्नाटा था। पापा अपनी उसी पुरानी आरामकुर्सी पर बैठे थे। उनके हाथ में अखबार था, लेकिन उनकी नज़रें अखबार पर नहीं, बल्कि सामने लगी मेरी शादी की तस्वीर पर टिकी थीं।
​तभी उनके फोन की घंटी बजी। पापा ने बहुत हड़बड़ी में फोन उठाया, जैसे वो किसी खास कॉल का ही इंतज़ार कर रहे थे। लेकिन स्क्रीन देखकर उनके चेहरे की वो चमक तुरंत गायब हो गई। उन्होंने फोन कान से लगाया और बहुत थकी हुई आवाज़ में बोले— "नहीं भैया, अभी लोन नहीं चाहिए।" और कॉल काट दिया।
​🥺 ...
​पापा ने फोन वापस टेबल पर रखा और बहुत ठंडी सांस लेकर अपने आप से ही बोले— "लगा बिटिया का फोन है... वो रविवार को इसी समय करती है ना।"
​तभी मम्मी रसोई से पानी लेकर आईं और बोलीं— "अरे, अभी तो दोपहर के दो बजे हैं, वो ससुराल के कामों में व्यस्त होगी, कर लेगी शाम तक।"
​पापा ने अखबार टेबल पर रखते हुए बहुत धीरे से कहा— "घर कितना शांत हो गया है ना? पहले इस वक्त वो पूरे घर को सिर पर उठाए रखती थी। अब तो फोन की घंटी बजती है तो लगता है उसी का कॉल होगा। बेटियां घर की रौनक होती हैं, उनके जाते ही दीवारें भी खामोश हो जाती हैं।"
​मैं दरवाज़े के पीछे खड़ी यह सब सुन रही थी और मेरे आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। जिस पिता को मैंने हमेशा एक चट्टान की तरह मजबूत देखा था, जो विदाई के वक्त भी नहीं रोए थे... वो मेरी एक कॉल के लिए इतने बेताब रहते हैं, यह मुझे आज समझ आया था।
​मैं दौड़कर अंदर गई और पापा के गले लग गई। पापा चौंक गए, उन्होंने मुझे कसकर पकड़ लिया और उनके हाथों का वो कंपन बता रहा था कि वो मुझे कितना मिस करते हैं।
​हम बेटियाँ शादी करके नए घर में व्यस्त हो जाती हैं, नए रिश्तों को संभालने लगती हैं। लेकिन उस पुराने घर में एक बूढ़ा बाप आज भी हर घंटी पर यही उम्मीद करता है कि स्क्रीन पर उसकी लाडली का नाम चमकेगा।

​💬 क्या आपके पापा भी आपकी एक कॉल का ऐसे ही इंतज़ार करते हैं? क्या शादी के बाद आपको भी अहसास हुआ कि पापा भले ही कुछ न कहें, पर वो आपको सबसे ज़्यादा याद करते हैं?
​अपने पापा को याद करते हुए नीचे कमेंट्स में अपने दिल की बात ज़रूर लिखें! 👇✨

​ ❤️

कल मैं रिक्शे से घर आई...मैंने रिक्शे वाले से पूछा- भैय्या आपके बच्चे हैं, अगर बुरा न मानें तो, कुछ छोटे कपड़े मैं उनके ...
22/08/2026

कल मैं रिक्शे से घर आई...मैंने रिक्शे वाले से पूछा- भैय्या आपके बच्चे हैं, अगर बुरा न मानें तो, कुछ छोटे कपड़े मैं उनके लिए दे दूँ,
आप पहनाओगे क्या..??
उसने कहा - जी मैम साहब...मैंने कहा - आप घर के अंदर आ जाओ सोफे पर बैठो मैं कपड़े लाती हूँ! जब तक मैं कपड़े लाई वो बाहर ही खड़ा रहा,
ये देख मैंने कहा -भैय्या बैठ जाओ और देख लो जो कपड़े आपके काम आ जायें ..काँपते हुए वो सोफे पर बैठ गया शायद उसे बुखार भी था!

मैंने कहा -ठण्ड लग रही है तो चाय बना दूँ, आप पी लो..ये सुनते ही उसकी आँखो से आंसू बहने लगे, बोला नहीं मैम साहब बहुत छोटेपन से रिक्शा चला रहा हूँ! आज तक ऐसा कोई नहीं मिला जो, इतनी इज़्ज़त दे हम जैसे लोगो को, और ये जो कपड़े हैं जो आप लोग हम जैसों को देते हैं! हम लोग इसको रोज़ न पहन कर रिश्तेदारी या शादी- पार्टी में पहन कर जाते हैं! बहुत ग़रीबी है साहब... दो हफ़्ते बाद घर जाऊंगा तब बच्चे ये कपड़े पहनेंगे बहुत दुआ देंगे मैम साहब आपको...
ये बात सुनते ही मन बोझिल सा हो गया, फ़िर... मन में यही ख्याल आया..!!
बेजान_पत्थर के आगे मंदिर में दान करने से, तो अच्छा है! किसी जिन्दा व्यक्ति की जरूरतें पूरी की जाएँ... आपका_क्या_विचार_है_दोस्तो..??

जिसने भी ऐसा किया उसे दिल की गहराइयों से धन्यवाद... credit for unknown 🪻🪻🙏🙏

 #विवाहित_पुरुष_अवश्य_पढ़ें।कुछ दिन पहले मेरे पास एक फ्रेंड रिक्वेस्ट आई ।यह किसी "सिम्पी शर्मा" के नाम से थी ।एक्सैप्ट क...
22/08/2026

#विवाहित_पुरुष_अवश्य_पढ़ें।
कुछ दिन पहले मेरे पास एक फ्रेंड रिक्वेस्ट आई ।
यह किसी "सिम्पी शर्मा" के नाम से थी ।
एक्सैप्ट करने से पहले मैने आदतन उसकी प्रोफाइल को चैक किया...
तो पता चला अभी तक उसकी मित्रता सूची में कोई भी नहीं है ।
शक हुआ कि कहीं कोई "फेक" तो नहीं है
फिर सोचा नहीं...., फेक नहीं हो सकती.....
हो सकता है फेसबुक ने इस यूजर को नया मानते हुए इसे मेरे साथ मित्रता करने के लिए सज्जेस्ट किया हो...
प्रोफाइल फोटो नदारद देखकर मैनें अंदाजा लगाया..
शायद नई हो.......?
और उसे फोटो अपलोड करनी नहीं आती या फिर वो संकोची भी हो सकती है......
खैर, मैनें रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली..
सबसे पहले उसकी ओर से धन्यवाद आया..
फिर मेरे हर स्टेटस को "लाईक और कमेंटस"मिलने शुरू हो गए.......
मैं अपने इस नए कद्रदान को पाकर बेहद खुश हुआ..
सिलसिला आगे बढ़ा......... और
अब मेरी निजी जिंदगी से संबधित कमेंटस आने लगे....
मेरी पसंद नापसंद को पूछा जाने लगा......
अब वो कुछ "रोमांटिक सी शायरी" भी पोस्ट करने लगी थी......
एक दिन मोहतरमा ने पूछा :- क्या आप अपनी "बीवी से प्यार" करते हैं ?
मैनें झट से कह दिया :-हां.... .
वो चुप हो गई
अगले दिन उसने पूछा :- क्या आपकी मैडम "सुंदर" है ?
इस बार भी मैने वही जवाब दिया :-हां, बहुत सुंदर है.....
अगले दिन वो बोली :-क्या आपकी बीवी खाना अच्छा बनाती है........?
"बहुत ही स्वादिष्ट" मैनें जवाब दिया
फिर कुछ दिन तक वो नजर नहीं आई.........
अचानक कल सुबह उसने मैसेज बाक्स में लिखा "मैं आपके शहर में आई हूँ.......
क्या आप मुझसे."मिलना"चाहेंगे..?
मैनें कहा :- जरूर...
"तो ठीक है आ जाइये "सिने गार्डन"में मिल भी लेंगे और "मूवी" भी देख लेंगे.......
मैनें कहा :- नहीं, "मैडम आप आ जाइये मेरे."घर" पर.........
मेरे "बीवी-बच्चे"आपसे मिलकर खुश होंगे.......
मेरी बीवी के हाथ का खाना भी खाकर देखियेगा.........
बोली :- नहीं, मैं आपकी मैडम के सामने नहीं आऊंगी...... आपने आना है ,तो आ जाओ....
मैंने उसे अपने यहाँ बुलाने की काफी कोशिश की मगर वो नहीं मानी.......
वो बार बार अपनी पसंद की जगह पर बुलाने की जिद पर अड़ी थी.........
और मैं उसे अपने यहां.......
आखिरकार वो झुंझला उठी और बोली :-ठीक है, मैं वापिस जा रही हूँ....... तुम डरपोक अपने घर पर ही बैठो.......?
मैनें फिर उसे "समझाने" का प्रयास किया और सार्वजनिक स्थल पर मिलने के खतरे गिनायें पर वो नहीं मानी..........
हार कर मैंने कह दिया :-मुझसे मिलना है तो मेरे परिवार वालों के सामने मिलो, नहीं तो अपने घर जाओ.....
वो "ऑफलाइन" हो गई......
शाम को घर पहुँचा,तो डायनिंग टेबल पर."लज़ीज खाना" सजा हुआ था........
मैनें पत्नी से पूछा:- कोई आ रहा है क्या खाने पर ?
वो बोली...
हां, "सिम्पी शर्मा" आ रही है......
मैंने कहा...
क्या............?
वो तुम्हें कहां मिली, तुम उसे कैसे जानती हो...?
"तसल्ली रखिये साहब,
वो..."मैं"....ही थी.....
आप मेरे जासूसी मिशन के दौरान परीक्षा में "पास" हुए...
आओ, मेरे सच्चे हमसफर, खाना खायें, ठंडा हो रहा है...!

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“माँ, आज बनारस से दीनानाथ चाचा का फोन आया था… उन्होंने बताया कि बड़ी ताई जी की हालत बहुत खराब है, और भैया-भाभी ने उन्हें...
22/08/2026

“माँ, आज बनारस से दीनानाथ चाचा का फोन आया था… उन्होंने बताया कि बड़ी ताई जी की हालत बहुत खराब है, और भैया-भाभी ने उन्हें घर के पीछे वाले पुराने स्टोर रूम में शिफ्ट कर दिया है, जहाँ अब उनका खाना-पीना भी अलग हो गया है।,,,,,!!!!!

शाम को ऑफिस से लौटते ही सिद्धार्थ ने सोफे पर बैठते हुए बहुत ही शांत स्वर में यह बात कही थी। लेकिन उसके इन शब्दों ने मेरे भीतर जैसे एक भूचाल ला दिया। मेरे हाथ से चाय का कप छूटते-छूटते बचा।,,,,,!!!!!

“क्या कह रहा है तू सिद्धू? ताई जी… कल्याणी ताई जी उस सीलन भरे कमरे में हैं?” मेरी आवाज़ कांप रही थी।

सिद्धार्थ ने गहरी सांस ली और कहा, “हाँ माँ। दीनानाथ चाचा कह रहे थे कि ताई जी ने अपनी सारी पैतृक संपत्ति और बैंक बैलेंस दोनों बेटों के नाम कर दिया है। जब तक उनके पास पैसा था, तब तक वो घर की मालकिन थीं। अब बेटों के लिए वे सिर्फ एक बोझ बन गई हैं।,,,,!!!!!

मेरी आँखों के सामने पच्चीस साल पुराना वो मंजर तैर गया। जब सिद्धार्थ के पिता का अचानक दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो गया था, तब मैं महज छब्बीस साल की थी। मेरी अपनी ससुराल वालों ने मुझे ‘मनहूस’ कहकर घर से निकाल दिया था। एक छोटी सी अटैची और तीन साल के सिद्धार्थ को सीने से लगाए मैं सड़क पर खड़ी थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं कहाँ जाऊं।,,,,!!!!

उसी वक्त कल्याणी ताई जी—जो रिश्ते में मेरे पति की दूर की चचेरी भाभी लगती थीं—मेरे लिए साक्षात भगवान बनकर आई थीं। उन्होंने अपने पति और समाज की परवाह किए बिना मेरा हाथ थाम लिया था।,,,,,!!!!!

“निर्मला! जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं, तुम दोनों माँ-बेटे को कोई अनाथ नहीं कह सकता। यह घर जितना मेरा है, उतना तुम्हारा भी है,” ताई जी ने अपने पल्लू से मेरे आंसू पोंछते हुए कहा था।

वे खुद कोई बहुत अमीर नहीं थीं, लेकिन उनके दिल की रईसी का कोई मुकाबला नहीं था। उन्होंने अपने खर्चे काटकर सिद्धार्थ की स्कूल की फीस भरी। मेरे पहनने के लिए वे अपनी सबसे अच्छी साड़ियाँ मुझे दे देती थीं और खुद पुरानी साड़ियों में काम चला लेती थीं। जब सिद्धार्थ बीमार पड़ता, तो वे रात-रात भर उसके सिरहाने बैठकर उसके माथे पर पट्टियां रखती थीं। आज अगर मेरा बेटा एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में इतने ऊंचे पद पर है, तो उसकी नींव में ताई जी का पसीना और उनका आशीर्वाद ही है।,,,,,!!!!!

“सिद्धू! मुझे कल ही बनारस जाना है। मैं अपनी ताई जी को उस नरक में नहीं छोड़ सकती,” मैंने आंसुओं को रोकते हुए कहा।

सिद्धार्थ ने मेरे पास आकर मेरे कंधे पर हाथ रखा। “मैं जानता था माँ कि आप यही कहेंगी। मैंने कल सुबह की फ्लाइट और आगे के लिए कैब बुक कर ली है। हम सिर्फ उनसे मिलने नहीं जा रहे हैं, हम उन्हें हमेशा के लिए अपने पास दिल्ली लेकर आएंगे।,,,,,,!!!!!

मेरे बेटे के इन शब्दों ने मेरे सीने को गर्व से चौड़ा कर दिया। अगली सुबह हम बनारस के लिए निकल पड़े। रास्ते भर मेरा मन अतीत की गलियों में भटकता रहा। ताई जी का वो रौबदार चेहरा, उनके माथे की वो बड़ी सी लाल बिंदी और पूरे घर में गूंजती उनकी खनकती हुई आवाज़। वे उस घर की धुरी थीं। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि जिन बेटों को उन्होंने अपनी जान से ज्यादा चाहा, वे उनके साथ ऐसा सुलूक कर सकते हैं।,,,,,,!!!!!

दोपहर के करीब हमारी कैब उस पुराने लेकिन अब पूरी तरह से रेनोवेट हो चुके आलीशान मकान के सामने रुकी। बाहर दो महंगी गाड़ियां खड़ी थीं। हम अंदर दाखिल हुए। ड्राइंग रूम में ताई जी का बड़ा बेटा विकास और उसकी पत्नी बैठे टीवी देख रहे थे। हमें अचानक सामने खड़ा देखकर उनके चेहरों का रंग उड़ गया।

“अरे चाची! आप… अचानक? और सिद्धार्थ तुम भी?” विकास ने हड़बड़ाते हुए कहा।,,,,!!!!

सिद्धार्थ ने कोई औपचारिकता नहीं दिखाई। “भैया, ताई जी कहाँ हैं?” उसकी आवाज़ में एक अजीब सी सख्ती थी।

विकास की पत्नी ने झेंपते हुए कहा, “अरे वो… माँ जी को सीढ़ियां चढ़ने में दिक्कत होती है ना, इसलिए उन्हें नीचे पीछे वाले कमरे में रखा है। आप लोग बैठिए, मैं चाय लाती हूँ।,,,,,!!!!

“चाय की जरूरत नहीं है भाभी,” सिद्धार्थ ने कहा और सीधे घर के पिछले हिस्से की तरफ बढ़ गया। मैं भी उसके पीछे-पीछे भागी।

पीछे का वह कमरा कभी कबाड़ रखने के काम आता था। वहां रौशनी का कोई खास इंतज़ाम नहीं था और दीवारों से सीलन की बदबू आ रही थी। एक पुरानी सी लोहे की चारपाई पर एक बेहद कमजोर और बीमार सी काया लेटी हुई थी।,,,,,!!!!!

“ताई जी…” मेरे मुंह से एक चीख सी निकल गई।

वे चौंक कर उठीं। उनकी आँखों की रौशनी शायद कमज़ोर हो गई थी। उन्होंने मुझे पास आते देखा तो उनके झुर्रियों भरे चेहरे पर एक अविश्वास भरी मुस्कान खिल गई।,,,,,,!!!!

“निर्मला? मेरी निर्मला आई है?” उनकी आवाज़ में इतनी कमजोरी थी कि मेरे दिल के टुकड़े हो गए।

मैं दौड़कर उनके पैरों में गिर पड़ी और फफक-फफक कर रोने लगी। “यह क्या हालत बना ली है आपने अपनी दीदी? आपने मुझे खबर क्यों नहीं की?”

ताई जी ने कांपते हाथों से मेरा सिर उठाया और मेरे गालों को चूम लिया। “अरे पगली, रोती क्यों है? मैं तो ठीक हूँ। बस उम्र हो गई है ना, इसलिए शरीर साथ नहीं देता। और बच्चों की अपनी जिंदगी है, उन्हें क्यों परेशान करना।” उनका वो झूठा पर्दा आज भी उनके बेटों के गुनाहों को छिपाने की कोशिश कर रहा था।

तभी सिद्धार्थ आगे बढ़ा। उसने ताई जी के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। “ताई जी, आप मुझे भूल गईं क्या?”

ताई जी की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। “मेरा सिद्धू… मेरा शेर बच्चा। कितना बड़ा हो गया है तू। तुझे देखकर तो मेरी आधी बीमारी ऐसे ही खत्म हो गई।” उन्होंने सिद्धार्थ का माथा चूम लिया।,,,,!!!!

“ताई जी, चलिए उठिए। आपको हमारे साथ दिल्ली चलना है,” सिद्धार्थ ने बड़े ही सहज भाव से कहा, मानो यह कोई प्रस्ताव नहीं, बल्कि एक बेटे का अधिकार हो।,,,,,!!!!!

ताई जी ने उदास मन से मुस्कुराने की कोशिश की। “मैं कहाँ जाऊंगी बेटा? अब तो मेरी उम्र इस चारपाई से बंध कर रह गई है। और तुम लोगों को अपनी इस बीमार ताई से क्यों परेशानी उठानी है?”

“परेशानी?” सिद्धार्थ ने एक छोटा सा बैग उठाया और उसमें ताई जी की कुछ दवाइयां और कपड़े रखने लगा। “ताई जी, अगर पच्चीस साल पहले आपने वो ‘परेशानी’ नहीं उठाई होती, तो आज यह सिद्धार्थ सड़कों पर धक्के खा रहा होता। आपने तो मुझे अपना नाम तक दिया है, अब यह बेटा अपना फर्ज निभाएगा।,,,,,!!!!!

तभी दरवाजे पर विकास आ खड़ा हुआ। उसकी आँखों में गुस्सा और शर्म का मिलाजुला भाव था।

“यह क्या ड्रामा है सिद्धार्थ? तुम हमारी माँ को ऐसे कैसे ले जा सकते हो? समाज वाले क्या कहेंगे कि विकास ने अपनी माँ को घर से निकाल दिया? हमारी इज़्ज़त का मज़ाक बन जाएगा।” विकास की आवाज़ में अहंकार झलक रहा था।,,,,,!!!!!

मैंने मुड़कर विकास को देखना चाहा, पर सिद्धार्थ मेरे आगे आ खड़ा हुआ।

“इज़्ज़त? भैया, जिस माँ ने तुम्हें इस आलीशान घर में रहने लायक बनाया, उसे तुमने इस बदबूदार कोठरी में सड़ने के लिए छोड़ दिया, तब तुम्हारी इज़्ज़त कहाँ गई थी?” सिद्धार्थ ने बिना चिल्लाए, लेकिन बेहद तीखे स्वर में कहा।,,,,,!!!!

विकास तिलमिला उठा। उसने ताई जी की तरफ देखकर एक भद्दा सा तंज कसा। “तुम तो हमेशा पूरे मोहल्ले में सीना तान कर कहती थीं न माँ… कि मैं इस घर की बहू हूँ और जिस चौखट पर मेरी डोली आई थी, अब मेरी अर्थी यहीं से उठेगी! आज इन गैरों के साथ जाते हुए तुम्हें शर्म नहीं आ रही,,,,,!!!!!

इस निर्दयी व्यंग्य को सुनकर मेरे बदन में जैसे आग लग गई। मैं कुछ बोलने ही वाली थी कि सिद्धार्थ ने ताई जी को सहारा देकर अपने कंधे के सहारे खड़ा किया और विकास की आँखों में सीधे देखते हुए एक ऐसा जवाब दिया जिसने पूरे कमरे में सन्नाटा खींच दिया।

“भैया! अर्थी को चौखट की नहीं, उसे उठाने वाले एक मजबूत कांधे की जरूरत होती है। और जो बेटे जीते जी अपनी माँ का सहारा न बन सकें, उनके कांधों पर अर्थी भी बोझ बन जाती है… चलिये ताई जी, आपका बेटा अभी जिंदा है!,,,,,,!!!!!

सिद्धार्थ ने ताई जी का एक हाथ अपने कंधे पर रखा और उन्हें धीरे-धीरे उस कोठरी के अंधेरे से बाहर रौशनी की तरफ ले आया। ताई जी की आँखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन आज उन आंसुओं में लाचारी नहीं, बल्कि एक असीम सुकून और वात्सल्य था। विकास सिर झुकाए खड़ा रह गया, उसके पास कहने को अब कोई शब्द नहीं बचे थे।,,,,,!!!!

गाड़ी में बैठते हुए मैंने सिद्धार्थ की तरफ देखा। आज मेरे बेटे ने सिर्फ अपनी ताई जी का ही नहीं, बल्कि मेरे उस दूध का और पच्चीस साल पहले लिए गए उस इंसानियत के कर्ज़ को ब्याज समेत उतार दिया था,,,,,
Credit
अंबिका सरगम ♥️ ।

"अदालत में केस लड़ते-लड़ते वकील के हाथ में आई पत्नी की मौत की खबर! लेकिन उन्होंने जो किया उसे देखकर पूरे कोर्ट रूम में स...
22/08/2026

"अदालत में केस लड़ते-लड़ते वकील के हाथ में आई पत्नी की मौत की खबर! लेकिन उन्होंने जो किया उसे देखकर पूरे कोर्ट रूम में सन्नाटा छा गया। जानिए सरदार पटेल के इस चट्टान जैसे कलेजे की सच्ची कहानी!"

​यह बात उस समय की है जब सरदार वल्लभभाई पटेल देश के महान नेता नहीं बने थे, बल्कि अहमदाबाद के एक बेहद सफल और जाने-माने वकील थे। अपनी तेज़ बुद्धि और अचूक तर्कों के लिए पूरे कोर्ट में उनकी धाक थी।

​एक दिन सरदार पटेल कोर्ट रूम में एक बहुत ही पेचीदा और गंभीर आपराधिक मामले में अपने मुवक्किल की पैरवी कर रहे थे। केस बहुत नाज़ुक मोड़ पर था और उनका एक-एक तर्क उनके मुवक्किल की ज़िंदगी या मौत का फैसला करने वाला था।

​सरदार पटेल पूरे ध्यान और लगन के साथ जज के सामने अपनी बात रख रहे थे। तभी एक टेलीग्राम (तार) लेकर एक डाकिया कोर्ट रूम में आया। उसने वह कागज सरदार पटेल के हाथ में थमा दिया।

​सरदार पटेल ने बहस रोककर उस कागज को खोला, पढ़ा और उसे चुपचाप मोड़कर अपनी जेब में रख लिया। उनके चेहरे पर न कोई शिकन आई, न कोई आंसू छलका और न ही उनके हाव-भाव में ज़रा सा भी बदलाव आया।

​वे दोबारा उसी पुरानी लय और तेवर में जज के सामने केस की बहस करने लगे। उन्होंने लगातार कई घंटों तक ज़ोरदार पैरवी की और आखिरकार अपने मुवक्किल को उस केस में बेगुनाह साबित करके जिता दिया!

​जब जज ने अपना फैसला सुना दिया और कोर्ट की कार्यवाही खत्म हुई, तो उनके एक साथी वकील ने उत्सुकता से पूछा,

"पटेल साहब! उस टेलीग्राम में क्या लिखा था? क्या कोई ज़रूरी खबर थी?"

​सरदार पटेल ने बहुत ही भारी लेकिन शांत आवाज़ में अपनी जेब से वह कागज निकाला और कहा:

​"मेरी पत्नी का अस्पताल में निधन हो गया है..."

​यह सुनते ही पूरा कोर्ट रूम सन्न रह गया! जज से लेकर साथी वकील तक सबकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

​जब उनसे पूछा गया कि इतनी बड़ी खबर मिलने के बाद भी आपने तुरंत कोर्ट छोड़कर जाने के बजाय केस की बहस जारी क्यों रखी, तो सरदार पटेल ने जो जवाब दिया, उसने सबकी आँखें खोल दीं। उन्होंने कहा:

​"उस वक्त मेरी पत्नी तो जा चुकी थी, उसे मैं वापस नहीं ला सकता था। लेकिन अगर मैं उस पल कोर्ट छोड़कर चला जाता, तो जिस इंसान ने मुझ पर भरोसा करके अपनी ज़िंदगी मेरे हाथों में सौंपी थी, उसे फांसी हो जाती। मेरा पहला कर्तव्य उस इंसान की जान बचाना था।"

​यह प्रसंग हमें सिखाता है कि कर्तव्य और मानसिक दृढ़ता क्या होती है। जीवन में चाहे कितना भी बड़ा व्यक्तिगत संकट या दुख आ जाए, अगर इंसान अपने कर्तव्य और अनुशासन से नहीं डिगता, तो वह इतिहास रच देता है।

"दोस्तों, लौह पुरुष सरदार पटेल के इस फौलादी जिगरे और कर्तव्यनिष्ठा के लिए एक लाइक तो बनता है! अगर आपको भी भारत के इस महान सपूत पर गर्व है, तो कमेंट में 'सरदार पटेल अमर रहें' या 'जय हिंद' ज़रूर लिखें और ऐसी ही रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानियों के लिए हमारी प्रोफाइल को अभी follow करें!"

उधारी का पैसा जब तक आप नहीं मांगे तब तक तो ठीक है लेकिन जिस दिन से आप अपना दिया हुआ पैसा वापिस मांगने जाएँगे उस दिन से स...
22/08/2026

उधारी का पैसा जब तक आप नहीं मांगे तब तक तो ठीक है लेकिन जिस दिन से आप अपना दिया हुआ पैसा वापिस मांगने जाएँगे उस दिन से सामनेवाला आपको बुरा समझने लगेगा, उनमे से कुछ दुश्मन बन जाएँगे, कुछ बातचीत करना बंद कर देंगे, कुछ बदनामी करने में लग जाएँगे, कुछ धोखाधड़ी करने मे लग जाएँगे और कुछ जान के पीछे पड़ जाएँगे, बहुत कम लोग ही ऐसे होते है जो कि इज्जत से समय पर पैसा लौटा दे, जब उन्हें उधारी देंगे तो कोई नही जानेगा, लेकिन जब वापिस मांगने जाएँगे तो वे लोग हंगामा खड़ा कर देंगे और पूरा दुनिया जान जायेगी..!

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