17/10/2020
ऊँ विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम्।
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजस: प्रभु:।।1।।
ब्रह्मोवाच
त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कार: स्वरात्मिका।
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता।।2।।
अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषत:।
त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा।।3।।
त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत्।
त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा।।4।।
विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने।
तथा संहृतिरुपान्ते जगतोsस्य जगन्मये।।5।।
महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृति:।
महामोहा च भवती महादेवी महासुरी।।6।।
प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी।
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा।।7।।
त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा।
लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्ति: क्षान्तिरेव च।।8।।
खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणि तथा।
शंखिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा।।9।।
सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी।
परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी।।10।।
यच्च किंचित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके।
तस्य सर्वस्य या शक्ति: सा त्वं किं स्तूयसे तदा।।11।।
यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत्।
सोsपि निद्रावशं नीत: कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वर:।।12।।
विष्णु: शरीरग्रहणमहमीशान एव च।
कारितास्ते यतोsतस्त्वां क: स्तोतुं शक्तिमान् भवेत्।।13।।
सा त्वमित्थं प्रभावै: स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता।
मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ।।14।।
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु।
बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ।।15।।
।।इति तन्त्रोक्तं रात्रिसूक्तं सम्पूर्णम्।।