13/05/2025
बांग्लादेश के जन्म की कहानी
************************
15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश शासन से मुक्त होकर भारत ने एक स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा प्राप्त किया, लेकिन इसके साथ ही बंटवारे का भी दंश झेला। भारत को बांटकर एक अलग मुल्क पाकिस्तान बनाया गया जो कि भौगोलिक कारणों से दो हिस्सो में बंटा हुआ था- पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान। एक हिस्सा भारत के पश्चिम में जिसे पश्चिमी पाकिस्तान कहा गया और दूसरा भारत के पूर्वी छोर पर जिसे पूर्वी पाकिस्तान कहा गया। अविभाजित भारत के बंगाल प्रान्त का पूर्वी इलाका मुस्लिम बहुल क्षेत्र होने के कारण पूर्वी पाकिस्तान के रूप में पाकिस्तान में शामिल हो गया। उल्लेखनीय है कि पूर्वी पाकिस्तान में देश की 56 प्रतिशत आबादी रहती थी, जो बांग्ला भाषा बोलती थी। वहीं पश्चिमी पाकिस्तान में उर्दू, पंजाबी, सिंधी, बलूची, पश्तो और अन्य स्थानीय भाषाओं के बोलने वाले रहते थे।
सांस्कृतिक वर्चस्व और गैर बराबरी का सलूक
पाकिस्तान के रूप में नवोदित मुल्क के शासन- प्रशासन पर पश्चिमी पाकिस्तान का दबदबा कायम हो गया। वहीं के लोग राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर सेना तक में अहम पदों पर थे। सरकार का मुख्यालय पश्चिमी विंग में स्थापित किया गया था। इसके अलावा, केंद्र सरकार में विभिन्न जातीय, प्रादेशिक और भाषाई समूहों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व समान नहीं था। इसमें पश्चिमी पाकिस्तान के कुलीन व धनाढ्य समूहों, मुख्य रूप से पंजाबियों का वर्चस्व था।
दरअसल, पाकिस्तान पर प्रारंभ से ही पंजाबियों सुन्नियों का ही कब्जा रहा है जो आज भी है। वहां पर बलूच, पख्तून, सिंधि या अन्य प्रांत के लोगों का कोई जोर नहीं चलता है।
एक ओर जहां भाषा का मुद्दा काफ़ी अहम था, वहीं दूसरी ओर आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर पूर्वी पाकिस्तानियों के प्रति पश्चिमी पाकिस्तान द्वारा किया जा रहा अन्याय भी पाकिस्तान के टूटने में इन कारकों का भी बड़ा हाथ है। पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान के बीच की दूरी किलोमीटर में 2000 से ज्यादा और सांस्कृतिक व भाषाई रूप से उससे भी ज्यादा थी। लेकिन भौगोलिक दूरी और भाषाई व सांस्कृतिक भिन्नता को नज़रअंदाज़ करते हुए धार्मिक समानता को प्राथमिकता दी गई। धर्म के आधार पर एक देश तो बन गया, लेकिन कई कारणों से राष्ट्रीय एकता के सूत्र में बंधकर लम्बे समय तक तक साथ रह नहीं पाया।
पश्चिमी पाकिस्तान का रवैया पूर्वी पाकिस्तान के साथ हमेशा ही भेदभावपूर्ण रहा। संसाधनों की बात करें तो पूर्वी पाकिस्तान बहुत समृद्ध था, लेकिन राजनीतिक बागडोर पूरी तरह पश्चिमी पाकिस्तान के हाथों में थी।
उनका अपने बंगाली मुस्लिम भाई-बंधुओं और उनके संगी-साथी नागरिकों के प्रति रवैया हेकड़ी, तिरस्कार और सर्वोच्चता के अहंकार से ग्रस्त बदमिजाज लोगों का था। पूर्वी हिस्से में राजनीतिक चेतना और नेतृत्व के कौशल की कमी नहीं थी, लेकिन उन्हें पाकिस्तान की राजनीति में कभी बराबर का प्रतिनिधित्व मिला ही नहीं।
शोधकर्ता और लेखिका अनम ज़कारिया ने अपनी किताब '1971, ए पीपल्स हिस्ट्री फ़्रॉम बांग्लादेश, पाकिस्तान एंड इंडिया' में लिखा है कि जो बात बार-बार सामने आई वो है- पश्चिमी पाकिस्तान द्वारा सांस्कृतिक वर्चस्व का प्रदर्शन करना। पूर्वी पाकिस्तानियों के ख़िलाफ़ नस्लीय शब्द इस्तेमाल किए जाते थे। उन्हें 'कमज़ोर और हीन' माना जाता था। उनके ख़िलाफ़ नस्लवादी रवैया और नैरेटिव बनाया गया और कहा जाता था कि उनकी संस्कृति 'हिंदू' है और इसे शुद्ध करना है।
अवामी मुस्लिम लीग का गठन और अस्मिता की लड़ाई
23 जून, 1949 को ढाका में पूर्व पाकिस्तान अवामी मुस्लिम लीग नामक एक नई राजनीतिक पार्टी का गठन किया गया था। इस पार्टी का धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक संस्कृति की ओर रुझान तब स्पष्ट हुआ जब 1955 में अवामी लीग ने अपने नाम से "मुस्लिम" शब्द हटा दिया।
27 जनवरी, 1952 को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ख्वाजा नजीमुद्दीन ने घोषणा की कि मोहम्मद अली जिन्ना की परिकल्पना के अनुसार उर्दू ही पाकिस्तान की एकमात्र राजकीय भाषा होगी। पाकिस्तानी हुकूमत का यह फैसला पूर्वी पाकिस्तान के लिए अस्मिता का सवाल बन गया था। पूर्वी पाकिस्तान के लोगों को बंगला संस्कृति एवं भाषा के प्रति प्यार था और वह किसी हाल में पाकिस्तानी हुकूमत के इस फैसले को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने अपनी अस्मिता की लड़ाई तभी से शुरू कर दी थी
1960 के दशक के मध्य में शेख मुजीब-उर-रहमान
जैसे नेताओं ने पश्चिमी पाक की नीतियों का सक्रिय रूप से विरोध करना शुरू कर दिया। फरवरी 1966 में लाहौर में एक सम्मेलन में मुजीब ने अवामी लीग की ओर से बोलते हुए पूर्वी पाकिस्तान को अधिक स्वायत्तता देने की मांग थी। जब मुजीब ने छह सूत्री एजेंडा पेश किया तो उन्हें कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा और इसे 'भारतीय साज़िश' करार दिया गया।
1971 का मुक्ति संग्राम
1970 में पाकिस्तान (तत्कालीन पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान) के आम चुनावों में, शेख मुजीब-उर-रहमान की अवामी लीग ने पूर्वी पाकिस्तान में 162 में से 160 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया। ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की पीपीपी ने पश्चिमी पाकिस्तान में 138 में से 81 सीटें जीतीं थीं। इस तरह पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान को मिलाकर नेशनल असेम्बली की कुल 300 में से आवामी लीग ने 160 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत प्राप्त कर लिया था। लेकिन पाकिस्तान की पीपुल्स पार्टी के जुल्फिकार अली भुट्टो और अन्य सैन्य अधिकारियों सहित पश्चिमी विंग के राजनीतिक दलों के प्रमुख राजनीतिक नेताओं ने जनरल याह्या ख़ान की सरकार ने साज़िश रचकर शेख मुजीब-उर-रहमान को सत्ता सौंपने से इनकार कर दिया। इस घटना ने लंबे समय से सुलग रही आग में घी का काम किया और यहीं से पाकिस्तान के टूटने की बुनियाद पड़ गई।
7 मार्च, 1971 को शेख मुजीब-उर-रहमान ने पूर्वी पाकिस्तान के लोगों से बांग्लादेश की आज़ादी के लिए व्यापक संघर्ष के लिए खुद को तैयार करने का आह्वान किया। पूरे पूर्वी पाकिस्तान में अशांति फैल गई, जहां उर्दू थोपने के खिलाफ बंगाली सांस्कृतिक राष्ट्रवाद द्वारा संचालित एक आंदोलन पहले से ही चल रहा था। बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए और आज़ादी के नारे लगाए गए। बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम की चिंगारी भड़क उठी।
पाकिस्तानी सेना का 'ऑपरेशन सर्चलाइट’
25 मार्च 1971 को पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में विरोध प्रदर्शनों को कुचलने के लिए
लेफ्टिनेंट जनरल टिक्का खान के नेतृत्व में नरसंहार के लिए ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ नामक सैन्य अभियान शुरू किया, जिसके तहत एक ही रात में 7,000 निहत्थे, निर्दोष बंगालियों को मार डाला गया। यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा। बांग्लादेश के आधिकारिक पक्ष के अनुसार पाकिस्तानी सेना ने कथित तौर पर 30 लाख लोग मारे थे। अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों और कई शोधकर्ताओं के अनुसार, पाकिस्तानी सेना ने 'नरसंहार' और 'महिलाओं के ख़िलाफ़ यौन अपराध' किए थे।
जब पाकिस्तानी सैनिक और उनके साथी बंगाली महिलाओं की अस्मत लूटते थे तो अपने इस घृणित कर्म को बंगालियों का डीएनए सुधारना बताते थे।
फ्रैंक जैकब द्वारा संपादित किताब ‘जेनोसाइड एंड मास वायलेंस इन एशिया’ में बताया गया है कि एक बार जब पाकिस्तानी सेना ने महसूस किया कि पूर्वी पाकिस्तान के संभ्रांतों को निशाना बनाने से यह लड़ाई किसी नतीजे पर पहुंचने वाली नहीं है तो जनरलों और उनकी सैनिकों ने इसका तरीका बदल दिया और बंगाली महिला आबादी को सक्रिय रूप से निशाना बनाने और उनके साथ बलात्कार शुरू कर दिया। इसमें कहा गया है, ‘यह नीति बंगाली समाज के पुरुषों और महिलाओं को मनोवैज्ञानिक रूप से तोड़ने की उम्मीद में अपनाई गई थी।’
इसी दौरान आंदोलन के प्रणेता शेख मुजीबुर रहमान को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। पाकिस्तानी सेना की पूर्वी पाकिस्तान में बर्बरतापूर्ण कार्रवाई का नतीजा यह हुआ कि वहां के 10 लाख लोग शरणार्थी होकर भारत आ गए। पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा, बिहार , उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में उन्होंने शरण ली। भारत पर आर्थिक बोझ बढ़ने लगा। यह भारत के लिए एक बड़ा संकट था और वह चुपचाप बैठकर सब कुछ देखता नहीं रह सकता था। हालांकि भारत ने स्वेच्छा से इन शरणार्थियों की नौ महीने तक देखभाल की।
पाकिस्तानी सेना की हिंसक कार्रवाइयों के कारण अवामी लीग के नेता, शेख मुजीबुर रहमान ने 26 मार्च 1971 को पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेश के रूप में स्वतंत्र घोषित कर दिया, और यह तारीख बांग्लादेश मुक्ति संग्राम की शुरुआत के रूप में मानी जाती है। तभी से बांग्लादेश इसी तारीख को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है।
25 मार्च को ढाका में सामूहिक हत्या और उसके बाद स्वाधीनता के ऐलान के बाद से भारत में इंदिरा गांधी सरकार अपनी भावी रणनीति तय करने के लिए बैठकों में जुटी थी। 26 मार्च को विपक्षी दलों के नेताओं के साथ उन्होंने बातचीत की और सभी से अनुरोध किया कि वे इस मुद्दे पर सार्वजनिक तौर पर बहस नहीं करें। बाद में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संसद में कहा कि सरकार पूर्वी पाकिस्तान के घटनाक्रम पर निगाह रख रही है और साथ ही उसे अंतरराष्ट्रीय कायदे-कानूनों का भी पालन करना होगा।
भारत की कूटनीतिक चाल
1971 का साल भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के इतिहास में काफी अहमयित रखता है। उसी साल भारत ने पाकिस्तान को वह जख्म दिया था, जिसकी टीस पाकिस्तान को हमेशा महसूस होती रहेगी। बांग्लादेश की बात करें तो यह वही साल था, जब दुनिया के नक्शे पर बांग्लादेश एक स्वतंत्र देश के रूप में उभरा। 1971 के उस इतिहास बदलने वाले युद्ध की शुरुआत 3 दिसंबर, 1971 को हुई थी। पाकिस्तान को तोड़कर बांग्लादेश नाम से एक नए मुल्क का निर्माण भारत की राजनीतिक और कूटनीतिक रूप से बहुत बड़ी सफलता थी। सिर्फ 24 साल पुराने आजाद भारत ने पाकिस्तान के ताकतवर दोस्त अमेरिका और चीन को हैरान कर दिया था। यह कैसे संभव हुआ? पूरा घटनाक्रम यह था:
व्यापक विचार- विमर्श के बाद 1971 के मार्च माह के अंत में भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मुक्तिवाहिनी की मदद करने का फैसला लिया। मुक्तिवाहिनी दरअसल पूर्वी पाकिस्तान की मिलिट्री, पैरामिलिट्री और नागरिकों की सेना थी। इसका लक्ष्य गुरिल्ला युद्ध के जरिए पूर्वी पाकिस्तान की आजादी था। 31 मार्च, 1971 को इंदिरा गांधी ने भारतीय सांसद में भाषण देते हुए पूर्वी बंगाल के लोगों की मदद की बात कही थी।
15 मई 1971 को भारतीय सेना ने 'ऑपरेशन जैकपॉट' लॉन्च किया और इसके तहत पाकिस्तान की सेना के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध में लगे मुक्ति बाहिनी सेनानियों की भर्ती करने, मुक्ति वाहिनी के लड़ाकों को ट्रेनिंग, हथियार, पैसा और साजो-सामान की सप्लाई मुहैया कराना शुरू किया। दूसरी तरफ भारतीय सेना पूर्वी पाकिस्तान की सीमा पर चौकसी बरते रही थी।
इंदिरा गांधी की रणनीति थी कि युद्ध कुछ दिनों तक ही चले, लेकिन लंबा खिंचता है तो दुनिया को पहले से ही पाकिस्तान की करतूत पता होनी चाहिए। इसके लिए मार्च से अक्टूबर 1971 तक इंदिरा ने दुनिया के कई नेताओं को पत्र लिखकर और ख़ुद विदेशों में ताबड़तोड़ दौरे कर भारत की सीमा पर चल रहे हालात की जानकारी दी। इंदिरा गांधी ने 21 दिन का जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, बेल्जियम और अमेरिका का दौरा भी किया था। हर देश में इंदिरा ने भारत के पड़ोस में पूर्वी पाकिस्तान में चल रहे नरसंहार का जिक्र किया। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को दो टूक शब्दों में बताया कि पूर्वी बंगाल की समस्या पाकिस्तान का आंतरिक मामला भर नहीं है। इसकी वजह से लाखों रिफ्यूजी भारत में आने को मजूबर हो रहे हैं और पाकिस्तान अपनी घरेलू समस्या को भारत की ओर धकेल रहा है।
भारत ने शीत युद्ध के दौरान वैश्विक भू-राजनीतिक संतुलन के लिए बेहद चुतराई से तत्कालीन सोवियत संघ से मित्रता और सहयोग संधि की। अगस्त 1971 में भारत-सोवियत संघ का संधि पर हस्ताक्षर करना भारत के लिये एक शूट-इन-द-आर्म के रूप में काम आया। इसी संधि के परिणामस्वरूप भारत को 1971 की जंग में सोवियत संघ का समर्थन प्राप्त हुआ। जब इंदिरा गांधी सोवियत रूस पहुंची, तो तत्कालीन राष्ट्रपति लियोनिद ब्रेझनेव ने इंदिरा को आश्वासन दिया था कि अगर भारत-पाकिस्तान युद्ध होता है तो सोवियत रूस उनके साथ होगा।
इससे उलट अमेरिका में तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन का इंदिरा गांधी के साथ व्यवहार काफी रूखा और अशिष्ट था। निक्सन और उनके विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर पहले से ही भारत के खिलाफ थे। पर इंदिरा गांधी ने कूटनीतिक चाल चलते हुए संबोधन का मौका मिलने पर सीधे अमेरिकी लोगों को पूर्वी पाकिस्तान की व्यथा सुना दी और पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना द्वारा किए जा रहे दमन और नरसंहार से उनको अवगत करवा दिया।
भारत का सीधा हस्तक्षेप
भारतीय सेना अभी तक एकदम सीधे खुद इस जंग में शामिल नहीं हुई थी, लेकिन दिसंबर 1971 में पाकिस्तान ने इसकी वजह दे डाली। वैसे 23 नवंबर, 1971 को पाकिस्तान के राष्ट्रपति याह्या खान ने पाकिस्तानियों से युद्ध के लिए तैयार रहने को कहा था। दिसंबर, 1971 को पाकिस्तान ने ऑपरेशन चंगेज खान लॉन्च किया। 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी एयरफोर्स ने भारत से हमले की आशंका में पश्चिमी क्षेत्रों पर हमला कर दिया था। 4 दिसंबर की सुबह तक भारत ने आधिकारिक रूप से पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया। हमले के दौरान इंदिरा कलकत्ता में थीं। वो जल्दी दिल्ली पहुंची और देश को संबोधित करते हुए कहा, "हम पर एक युद्ध थोपा गया है।" इन शब्दों से हमें इंदिरा की कूटनीति की एक झलक मिलती है।
6 दिसंबर को युद्ध के बीच में ही भारत ने बांग्लादेश को मान्यता दे दी और दूसरे देशों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित किया। नतीज़ा यह निकला कि दुनिया के कई अन्य मुल्कों ने भी बांग्लादेश को एक स्वतंत्र देश के रूप में स्वीकार कर लिया। हालांकि पाकिस्तान को ऐसा करने में दो साल का लंबा वक्त लग गया।
भारत को भयाक्रांत करने का अमेरिकी कुचक्र
जब भारत और पाकिस्तान का युद्ध शुरू हुआ तो अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन ने अमेरिका की सातवीं फ्लीट को बंगाल की खाड़ी में भेज दिया था। इस फ्लीट में दुनिया का सबसे बड़ा वॉरशिप भी शामिल था। निक्सन का अंदाजा था कि भारत इस कदम से घबरा जाएगा और पाकिस्तान पर भारत की कार्रवाई में कुछ ढील आएगी। भारत घबराया नहीं और सोवियत रूस से इंडो-सोवियत सुरक्षा समझौते का एक प्रावधान सक्रिय करने के लिए कहा। इस प्रावधान के मुताबिक, भारत पर हमला रूस पर हमला माना जाता। सोवियत रूस ने भारत के इस निवेदन को तत्काल स्वीकारा और अपनी एक फ्लीट बंगाल की खाड़ी के लिए रवाना कर दी। रूस की फ्लीट में भी अमेरिका की तरह परमाणु हथियार शामिल थे। इसी दौरान ब्रिटिश नेवी का भी एक समूह भारतीय क्षेत्र की तरफ बढ़ रहा था। इसे अमेरिका ने अपनी मदद और भारतीय नेवी को घेरने के लिए बुलाया था। लेकिन रूस की फ्लीट को देखकर ब्रिटिश नेवी वापस चली गई और अमेरिका भी कुछ नहीं कर पाया। रूस ने अपनी फ्लीट 13 दिसंबर 1971 को भेजी थी और तीन दिन बाद युद्ध का फैसला होने वाला था।
युद्ध शुरू होने के 13 दिन बाद यानी 16 दिसंबर 1971 को पूर्वी पाकिस्तान के कमांडर जनरल ए.ए.के. नियाजी के नेतृत्व में पाकिस्तान के लगभग 93,000 सैनिकों और सरकारी अधिकारियों ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। नियाजी ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर भारतीय सेना के पूर्वी कमांड इंचार्ज लेफ्टिनेंट जनरल जेएस अरोड़ा को सौंपकर इंस्ट्रूमेंट ऑफ सरेंडर साइन कर अपनी हार मान ली थी। इसके साथ ही 3 दिसंबर से जारी जंग खत्म हो गई थी। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से किसी सेना द्वारा सबसे बड़ा आत्मसमर्पण था।
16 दिसंबर की शाम 5 बजे जनरल सैम मानेकशॉ ने इंदिरा गांधी को फोन करके बताया कि ढाका अब मुक्त है और पाकिस्तानी सेना ने बिना शर्त सरेंडर कर दिया है। इंदिरा इसके बाद संसद गईं और कहा, “ढाका अब एक आजाद देश की राजधानी है। हम जीत के इस क्षण में बांग्लादेश के लोगों का अभिवादन करते हैं।”
सरेंडर के बाद इंदिरा ने तुरंत सीजफायर का ऐलान कर दिया। भारत की 1971 की जीत सिर्फ सैन्य लिहाज से ही बड़ी नहीं थी बल्कि इंदिरा ने अपनी कूटनीति से अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को बड़ी चतुरता में मात दी थी। रणनीति से उन्होंने सिर्फ 13 दिन में पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए थे। इस जंग में पाकिस्तान को करारी शिकस्त मिली थी। इस जीत ने विदेशी राजनीति में भारत की व्यापक भूमिका को परिभाषित किया।
पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण के साथ ही पाकिस्तान का विभाजन हुआ और एक नए देश बांग्लादेश का निर्माण हुआ। इसे यों कह सकते हैं कि नौ महीने के रक्तपात और तेरह दिनों की प्रसव पीड़ा से गुजर कर जन्मा था बांग्लादेश।
मुक्ति संग्राम की ख़िलाफ़त करने वाले कौन थे?
यहां इस तथ्य को भी रेखांकित करना समीचीन होगा कि बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में पाकिस्तानी सेना और पूर्वी पाकिस्तान में उसके स्थानीय सहयोगी, इनमें बिहारी मुस्लिम शरणार्थी और जमायत-ए-इस्लामी के कट्टर बंगाली इस्लामिक सदस्यों शामिल थे, उन्होंने ‘रजाकार’ नाम से स्थानीय लड़ाकू सेना बनाई थी जो कि मुक्ति वाहिनी सेना के ख़िलाफ़ लड़ रही थी। यह ऐसी ही स्थिति थी जैसे कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारत के कुछ कट्टरपंथी संगठन अंग्रेज़ों के मुख़बिर बनकर स्वतंत्रता संग्राम को चोट पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे।
पाकिस्तान के टूटन से सीख
पाकिस्तान से टूटकर अलग मुल्क़ बने बांग्लादेश की कहानी की यही सीख है कि किसी देश के किसी तबक़े के साथ जब भेदभाव किया जाता है, सत्ता के संरक्षण में अन्याय का कुचक्र चलाया जाता है तो इससे दिलों की दूरियां बढ़ना लाज़िमी है। सामाजिक, धार्मिक, भाषाई और प्रादेशिक भेदभाव अंततः देश की टूटन का सबब बनता है। देश के शीर्षस्थ नेता की यह जिम्मेदारी है कि वह देश में धार्मिक, सामाजिक, जातीय, प्रादेशिक आदि किसी भी आधार पर भेदभाव या उत्पीड़न करने वालों और आपसी सौहार्द को ख़त्म कर नफ़रत फैलाने वाले तत्त्वों को सख़्ती से कुचले। कैफ़ भोपाली की सीख ध्यान में रखी जानी चाहिए:
ये दाढ़ियाँ ये तिलक धारियाँ नहीं चलतीं
हमारे अहद में मक्कारियाँ नहीं चलतीं
क़बीले वालों के दिल जोड़िए मिरे सरदार
सरों को काट के सरदारियाँ नहीं चलतीं
पर जब किसी मुल्क का मुखिया ख़ुद ही नफ़रत की नीति पर चले तो फ़िर उस मुल्क़ को कौन बचाए? समझदार को इशारा काफ़ी है। बस, एक फ़िल्मी गाने की ये पंक्तियां ही सब कुछ कह देती हैं:
चिंगारी कोई भड़के, तो सावन उसे बुझाये
सावन जो अगन लगाये, उसे कौन बुझाये
✍️
-------