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28/10/2026
🙏🙏🙏      ।। भोजन पूर्व नैवेद्य।।🙏🙏🙏श्रीमद्भगवद्गीता कऽ अध्याय 12 श्लोक 13 श्रीकृष्ण भगवान कहै छथिन,जे व्यक्ति हमर देल वस...
28/10/2026

🙏🙏🙏 ।। भोजन पूर्व नैवेद्य।।🙏🙏🙏
श्रीमद्भगवद्गीता कऽ अध्याय 12 श्लोक 13 श्रीकृष्ण भगवान कहै छथिन,जे व्यक्ति हमर देल वस्तु हमरा अर्पण नहि कय स्वत : स्वयं भक्षण करैत छथि से चोर थिकाह।ईष्टभोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविता:।तैर्दत्तान्नप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव स:।यज्ञशिष्टाशिन:सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषै:।भुंजते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्।।आशय यज्ञ स शेष बाँचल अन्न खायवाला श्रेष्ठ पुरुष सब पाप स मुक्त भऽ जाइत छथि।
कुलाचार रुपेण दायां भाग में नैवेद्य दी आ जल लऽ
* ॐ विष्णवे नमः*ॐ दुर्गादेव्यै नमः* ॐ गणपतये नमः* ॐ इन्द्राय नमः* ॐ चन्द्राय नमः* ॐ अर्काय नमः* ॐ अग्नये नमः* ॐ ब्रह्मणे नमः* ॐ वसुभ्यो नमः।।एहि मंत्रे उत्सर्ग कय ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा कहि जलप्राशन करी।

🕉️ श्रीमद्भगवद्गीता महोत्सव: गीता हवन आ गीता पाठ प्रतियोगिता — एकटा पावन अवसर 🕉प्रिय बन्धुगण हरे कृष्णा, 🙏🙏🙏हमरा सभक आग्...
28/10/2026

🕉️ श्रीमद्भगवद्गीता महोत्सव: गीता हवन आ गीता पाठ प्रतियोगिता — एकटा पावन अवसर 🕉

प्रिय बन्धुगण हरे कृष्णा, 🙏🙏🙏

हमरा सभक आग्रह अछि जे अहाँ सभ एहि पावन गीता महोत्सवमे सहर्ष सहभागी हुअऽ आ एहि दिव्य आयोजनक अंग बनि अपने आ अपन परिवारकेँ लाभान्वित करऽ।

🌸 गीता महोत्सव: स्वरूप आ महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता केवल एकटा ग्रन्थ नहि, ई तँ जीवनक सँगी, मार्गदर्शक आ मुक्तिक द्वार अछि। गीता महोत्सव ओ पावन अवसर अछि जहिमे भगवान् श्रीकृष्णक दिव्य वाणीकेँ हवन, पाठ आ प्रतियोगिताक माध्यमसँ अपन जीवनमे उतारल जाइत अछि।

"श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।" (गीता ४/३९)
अर्थ: श्रद्धायुक्त, तत्पर आ इन्द्रिय-संयमी मनुष्य ज्ञान प्राप्त करैत अछि।

अर्थात्, श्रद्धा आ तत्परता सँ गीता-ज्ञानक लाभ अवश्य भेटैत अछि — आ गीता महोत्सव एहि श्रद्धाकेँ कर्ममे परिणत करबाक माध्यम अछि।

🔥 गीता हवन — किएक आवश्यक?

हवन (यज्ञ) भारतीय संस्कृतिक आध्यात्मिक हृदय अछि। गीता हवनमे गीताक श्लोकसभक आहुति दिइत अछि — ई शब्द-यज्ञ, ज्ञान-यज्ञ आ श्रद्धा-यज्ञक त्रिवेणी अछि।

"यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म।" (श्रुति-सार)
अर्थ: यज्ञ सभसँ श्रेष्ठ कर्म अछि।

"यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।" (गीता ३/९)
अर्थ: यज्ञकेँ लेल कएल गेल कर्म बाहेक अन्य कर्मसँ मनुष्य कर्मबन्धनमे बन्धल रहैत अछि।

गीता हवनसँ वातावरण शुद्ध होइत अछि, मन एकाग्र होइत अछि आ गीताक वचन हृदयमे बीज रूपमे स्थापित होइत अछि। ई वैदिक परम्परा आ गीता-ज्ञानक सुन्दर समन्वय अछि।

📖 गीता पाठ प्रतियोगिता — किएक महत्वपूर्ण?

"स्वाध्यायान्मा प्रमदः।" (गीता १६/१५ — तत्त्वबोधार्थ)
अर्थ: स्वाध्याय (शास्त्र-पाठ)सँ प्रमाद (असावधानी) दूर होइत अछि।

गीता पाठ प्रतियोगिता केवल प्रतिस्पर्धा नहि, ई एकटा साधना अछि —

· स्मरण-शक्ति वर्धित होइत अछि
· उच्चारण शुद्ध होइत अछि
· श्लोक हृदयमे बसैत अछि
· धैर्य आ एकाग्रता विकसित होइत अछि

"तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।" (गीता १६/२४)
अर्थ: कर्तव्य आ अकर्तव्यक निर्णयमे शास्त्रकेँ प्रमाण मानऽ।

प्रतियोगिताक माध्यमसँ बालक, युवा आ वृद्ध सभ गीता-शास्त्रक निकट आबैत छथि आ ई शास्त्र-प्रमाण जीवनक आधार बनैत अछि।

🌺 एकटा सङ्कल्प — सभ सँ आग्रह

एहि गीता महोत्सवमे अहाँ सभक सहभागिता केवल एकटा कार्यक्रम नहि, ई एकटा पुण्य-सङ्कल्प अछि। हवनमे आहुति, पाठमे स्वर, प्रतियोगितामे उत्साह — सभ मिलि गीताकेँ अपन जीवनमे साकार करैत अछि।

"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।" (गीता ३/३५)
अर्थ: अपन धर्म गुणहीन भेलैतो पर-धर्म सँ श्रेष्ठ अछि।

अतः अपन कर्तव्य आ अपन संस्कृतिकेँ अपनाबऽ — एहि महोत्सवमे सक्रिय रूपसँ जुड़ऽ, अपन परिवार आ मित्रसभकेँ सेहो जोड़ऽ, आ गीता-ज्ञानक लाभ सभ धरि पहुँचाबऽ।

आउ, सभ मिलि गीता महोत्सवकेँ सफल बनाबी आ अपने आ समाजकेँ लाभान्वित करी। 🌸🙏

🕉️ हरि ॐ तत् सत् 🕉️

— गीता महोत्सव आयोजन समिति🙏💐

एहि गीता महोत्सवक आयोजन में अपन अपन सहयोग प्रदान करबाक कृपा कयल जाय।स्केनर सचिव महोदयाक अछि आ संस्थानक एकाउंट विवरणी सेह...
27/10/2026

एहि गीता महोत्सवक आयोजन में अपन अपन सहयोग प्रदान करबाक कृपा कयल जाय।स्केनर सचिव महोदयाक अछि आ संस्थानक एकाउंट विवरणी सेहो देल गेल छैक जाहि पर पठेबाक कष्ट करी।🙏🙏🙏🙏🙏

।। अग्निवास विचार।।सैकातिथिर्वारयुताकृताप्ता: शेषे गुणेऽभ्रे भुविवहि्नवास:।सौख्याय होमे शशियुग्मशेषे प्राणार्थनाशौ दिवि ...
26/10/2026

।। अग्निवास विचार।।
सैकातिथिर्वारयुताकृताप्ता: शेषे गुणेऽभ्रे भुविवहि्नवास:।
सौख्याय होमे शशियुग्मशेषे प्राणार्थनाशौ दिवि भूतले च।।
आशय शुक्लादि पक्ष स ओ तिथि जाहि में कर्म हो ओहीक संख्या 5 वा 10 जे हुए ओहि मे वर्तमान रव्यादि दिन संख्या जोडि 1 और जोडि दी।फेर 4 स भाग देला पर यदि 3 या 0 शेष आवे त अग्निवास भूमि में जे सुखकारी।यदि 1 या 2 शेष हुए त अशुभ आशय सुखक लेश नहि
शुक्लादितिथि सं + सूर्यादिदिनसं+1 भागा 4 = 3,0 शेष शुभ।
अग्निवासक विशेषता
विवाह, यात्रा,व्रत,यज्ञ,नित्यनैमित्तिककार्य, यज्ञोपवीत, ग्रहण, रोग, पीड़ा,आ पूजनादि में अग्निवासक विचार नहि कयल जायत अछि।

🙏🙏🙏    ।। पवित्रीक महत्ता।।🙏🙏🙏जपहोमहरा ह्येते असुरा दैत्यरूपिण:।पवित्रकृत हस्तस्य विद्रवन्ति दिशो दश।।यथा वज्रं सुरेन्द्...
25/10/2026

🙏🙏🙏 ।। पवित्रीक महत्ता।।🙏🙏🙏
जपहोमहरा ह्येते असुरा दैत्यरूपिण:।
पवित्रकृत हस्तस्य विद्रवन्ति दिशो दश।।
यथा वज्रं सुरेन्द्रस्य यथा चक्रं हरेस्तथा।
त्रिशूलं च त्रिनेत्रस्य ब्राह्मणस्य पवित्रकम्।।
आशय जप होम फलक हरण करयवाली दैत्यरुपी असुर हाथ में पवित्र धारण देखि दशों दिशा में भागि जाइत अछि।जेना इन्द्रक वज्र, विष्णुक चक्र,आ शिवक त्रिशूल शस्त्र कहल जाइत अछि ताहि रुपे कर्मकर्ताक रक्षक पवित्री कहल जाइत अछि।पवित्री स्वर्ण,रजत्,ताम्र कऽ धारण करि,नहि तऽ कुशक पवित्री धारण करि।
ब्राह्मणक लेल चारिटा कुशक पवित्री, क्षत्रिय वैश्य शूद्रक लेल क्रमशः एक एकटा कुश कम कऽ पवित्री धारण करेबाक विधान बताओल गेल।
पितृकर्म में तीन गोट कुशक पवित्री बनेबाक चाही।
मार्कण्डेय पुराण स उद्धृत

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८४७२३६

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