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आवश्यकता है फुल टाइम दुकान पर काम करने वाले लड़के की वेतन योग्यता अनुसार
04/12/2021

आवश्यकता है फुल टाइम दुकान पर काम करने वाले लड़के की वेतन योग्यता अनुसार

व्रज - कार्तिक कृष्ण अमावस्या Sunday, 15 November 2020अन्नकूट कोटिन भांतनसो भोजन करत गोपाल ।आपही कहत तात अपनेसों गिरि मू...
15/11/2020

व्रज - कार्तिक कृष्ण अमावस्या
Sunday, 15 November 2020

अन्नकूट कोटिन भांतनसो भोजन करत गोपाल ।
आपही कहत तात अपनेसों गिरि मूरति देखो तत्काल ।।१।।
सुरपति से सेवक इनही के शिव विरंची गुण गावे ।
इनहीते अष्ट महा सिध्धि नवनिधि परम पदारथ पावे ।।२।।
हम गृह बसत गोधन बन चारत गोधन ही कुलदेव ।
इने छांड जो करत यज्ञ विधि मानो भींतको लेव ।।३।।
यह सुन आनंदे ब्रजवासी आनंद दुंदुभी बाजे ।।
घरघर गोपी मंगल गावे गोकुल आन बिराजे ।।४।।

गोवर्धन पूजा, अन्नकूट महोत्सव, गुजराती नववर्ष आरम्भ

अन्नकूट महोत्सव की सम्पूर्ण सेवा का निर्वाहन पूज्य श्री तिलकायत महाराजश्री व चि श्री विशाल बावाश्री करते हैं परंतु इस वर्ष महामारी प्रकोप के चलते महाराजश्री मुम्बई में ही विराजित हैं अतः महोत्सव की सम्पूर्ण सेवा श्री मुखियाजी के द्वारा ही सम्पन्न होगी. यद्यपि आलेख में हुज़ूरश्री एवं बावाश्री का ही उल्लेख है क्योंकि भले ही इस विकट परिस्तिथि में वे शशरीर उपस्तिथ ना हो लेकिन वे मानसिक रूप से यही हैं.)

(मन की बात आज के सारे क्रम वैसे ही होगे जैसे हमेशा होते हैं लेकिन कोविड गाइडलाइन के कारण दर्शन नहीं खुलेंगे मगर फिर भी पुरे आलेख में दर्शन खुलने का ज़िक्र इस लिये किया है ताकि सभी इस महोत्सव का सानुभाव करे)

विशेष – अमावस्या सुबह 10.36 बजे तक ही होने से एवं उसके पश्चात एकम होने से गोवर्धन पूजा, अन्नकूट महोत्सव, गुजराती नववर्ष आज माना गया हैं

आज शंखनाद होने के पश्चात श्रीनवनीतप्रियाजी अपने निज मंदिर में पधारते हैं.
आज लगभग 6.15 बजे उपरांत मंगला दर्शन खुलते हैं जो लगभग 1.30 घंटे खुले रहते हैं.
विगत कल (दीपावली की रात्रि) वस्त्र, श्रृंगार बड़े नहीं किये जाते अतः आज मंगला दर्शन उन्हीं वस्त्र, श्रृंगार में होते हैं.
मंगला दर्शन उपरांत डोल-तिबारी में अन्नकूट भोग सजाये जाने प्रारंभ हो जाते हैं अतः अन्य सभी समां के दर्शन भीतर होते हैं. दिन भर का पूरा सेवाक्रम भीतर होता रहता है.
रात्रि लगभग 8.30 बजे पश्चात अन्नकूट के दर्शन खुलते हैं जो कि लगभग 1 बजे तक होते हैं.
महोत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.
कार्तिक कृष्ण दशमी से आज कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा तक सात दिवस श्रीजी को अन्नकूट के लिए सिद्ध की जा रही विशेष सामग्रियां गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में अरोगायी जाती हैं.
ये सामग्रियां आज अन्नकूट उत्सव पर भी अरोगायी जाएँगी. इस श्रृंखला में आज विशेष रूप से श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में धांस (उड़द दाल) की बूंदी के लड्डू व दूधघर में सिद्ध की गयी केसरयुक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है.
राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता अरोगाया जाता है.
राजभोग पश्चात गोवर्धन पूजा की जाती है.

राजभोग दर्शन –

साज - श्रीजी में सर्व साज दीपावली के दिवस धरा हुआ ही आज भी धराया जाता है.

वस्त्र – श्रीजी को आज दीपावली के दिवस धरे गये श्वेत ज़री के वस्त्र ही धराये जाते हैं.

श्रृंगार वृद्धि में राजभोग के पश्चात ऊर्ध्व भुजा की ओर लाल रंग का ज़री का बिना तुईलैस किनारी बिना का पीताम्बर धराया जाता है जिनके दो अन्य छोर चौखटे के ऊपर रहते हैं.
ऐसा पीताम्बर वर्ष में दो बार (आज के दिन व जन्माष्टमी, नन्दोत्सव के दिन) धराया जाता है.
जन्माष्टमी, नन्दोत्सव के दिन यह केवल चौखटे पर धराया जाता है परन्तु आज यह श्रीहस्त में भी धराया जाता है.
प्रभु यह पीताम्बर गायों, ग्वालों और निजजनों पर फिरातें हैं जिससे उनको नज़र ना लगे.
चतुर्भुजदास जी ने इस भाव का एक पद भी गाया है.

खेली बहु खेली गाय, बुलाई घुमर घोरी ।
बछरा ऊपर 'ऊपरना फेरत’ दाढ़ मेल के डोरी ।।
आप गोपाल फ़ूक मारत है गौ सुत भरत अंकोरी ।
घों घों करत लकुट कर लीने ‘मुख फेरत पिछोरी’ ।।

श्रृंगार – आज अभ्यंग नहीं होता. सर्व श्रृंगार दीपावली के दिवस के ही रहते हैं.
आज दो जोड़ी के एक माणक और एक पन्ना की प्रधानता वाले शृंगार धरे जाते हैं. दोनो हालरा नहीं धराये जाते हैं.
केवल श्रीमस्तक के ऊपर लाल रंग की ज़री की तुई की किनारी वाला गौकर्ण धराया जाता है.
इसी प्रकार कुल्हे के ऊपर सिरपैंच बड़ा कर दिया जाता है और इसके बदले जड़ाव पान धराया जाता है.
कमलछड़ी एवं पुष्प मालाजी दीपावली के दिवस के होते हैं अतः बदले जाते हैं.
श्रीहस्त में जड़ाव सोने के वेणुजी और दो वेत्रजी धराये जाते हैं.









व्रज - कार्तिक कृष्ण द्वादशी(धनतेरस के आपके शृंगार) Thursday, 12 November 2020आज माई धन धोवत नंदरानी ।कार्तिक वदि तेरस द...
12/11/2020

व्रज - कार्तिक कृष्ण द्वादशी(धनतेरस के आपके शृंगार)
Thursday, 12 November 2020

आज माई धन धोवत नंदरानी ।
कार्तिक वदि तेरस दिन उत्तम गावत मधुरी बानी ।।१।।
नवसत साज श्रृंगार अनुपम करत आप मन मानी ।
कुम्भनदास लालगिरिधर को देखत हियो सिरानी ।।२।।

🌷🍀धनतेरस, धन्वन्तरी जयंती🍀🌷

आज मनमोहन रूपी धन को अपने ह्रदय में आत्मसात करते हुए धनतेरस के श्रृंगार के दर्शन का आनंद ले

विशेष – आज धनवन्तरी जयन्ती है. श्री धनवन्तरी, भगवान विष्णु के 17वें अवतार, देवों के वैध व प्राचीन उपचार पद्दति आयुर्वेद के जनक हैं.

आज के दिन को धनतेरस भी कहा जाता है. व्रज में गौवंश ही धन का स्वरुप है अतः श्री ठाकुरजी एवं व्रजवासी गायों का श्रृंगार करते हैं, उनका पूजन करते हैं एवं उनको थूली खिलाते हैं. आज से चार दिवस दीपदान का विशेष महत्व है अतः व्रज में सर्वत्र दीपदान और रौशनी की जाती है.

आज नन्दरानी यशोदाजी भौतिक लक्ष्मीजी की प्रतिमा को स्नान करा, श्रृंगार कर प्रभु के सम्मुख रखती हैं एवं बालक के पहनने के आभूषण को धोती हैं जिससे श्रीजी में मंगला दर्शन उपरांत ‘धन धोवत व्रजरानी’ जैसे पद गाये जाते हैं.

श्रीस्वामिनीजी ने श्रीठाकुरजी को अपना सर्वस्व मान कर धन के रूप में प्राप्त किया है ऐसा भाव भी है जिसे प्रदर्शित करते पद भी प्रभु के सम्मुख गाये जाते हैं – ‘राधा मन अति मोद बढ्यो है, मनमोहन धन पाई.’

आज की सेवा ललिताजी के भाव की है.

विगत दशमी से कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भाईदूज) तक प्रभु पूरे दिन झारीजी में यमुनाजल अरोगते हैं.
चारों समय (मंगला, राजभोग, संध्या व शयन) की आरती थाली में की जाती है.
गेंद, चौगान, दिवाला सभी सोने के आते हैं. आज दिनभर प्रभु को भोग स्वर्ण पात्रों में धरे जाते हैं.

उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.

श्रीजी को आज नियम के हरी सलीदार ज़री के चाकदार वागा एवं मोरपंख की चंद्रिका का वनमाला का श्रृंगार धराया जाता है. कत्थई आधारवस्त्र पर कला बत्तू के सुन्दर काम से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया पर मखमल की खोल आती है.

कार्तिक कृष्ण दशमी से कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (अन्नकूट उत्सव) तक सात दिवस श्रीजी को अन्नकूट के लिए सिद्ध की जा रही विशेष सामग्रियां गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में अरोगायी जाती हैं.

ये सामग्रियां अन्नकूट उत्सव पर भी अरोगायी जाएँगी.
इस श्रृंखला में आज विशेष रूप से श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में केशरयुक्त चन्द्रकला अरोगायी जाती है.
उत्सव होने के कारण विशेष रूप से दूधघर में सिद्ध की गयी केसरयुक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है.

राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता अरोगाया जाता है.
सखड़ी में केसरयुक्त पेठा, मीठी सेव आदि अरोगाये जाते हैं. अदकी में गेहूं के रवा की खीर अरोगायी जाती है.
भोग समय फीका के स्थान पर बीज-चालनी (घी में तले नमकयुक्त सूखे मेवे व बीज) अरोगाये जाते हैं.

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राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

गोधन पूजा करके गोविंद सब ग्वालन पहेरावत l
आवो सुबाहु सुबल श्रीदामा ऊंचे लेले नाम बुलावत ll 1 ll
अपने हाथ तिलक दे माथे चंदन और बंदन लपटावत l
वसन विचित्र सबन के माथें विधिसों पाग बंधावत ll 2 ll
भाजन भर भर ले कुनवारो ताको ताहि गहावत l
‘चत्रभुज’प्रभु गिरिधर ता पाछे धोरी धेनु खिलावत ll 3 ll

साज - श्रीजी में आज लाल रंग की मखमल के ऊपर सुनहरी सुरमा सितारा के कशीदे के ज़रदोज़ी के काम वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर लाल रंग की मखमल की बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज हरे रंग सलीदार ज़री की सूथन, चोली, चाकदार वागा एवं पटका धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र लाल रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला का (चरणारविन्द तक) भारी श्रृंगार धराया जाता है. मिलवा - हीरा, मोती, प्रमुखतया माणक, पन्ना एवं जड़ाव स्वर्ण के सर्व आभरण धराये जाते हैं.

श्रीमस्तक पर हरे रंग की सलीदार ज़री के चीरा (ज़री की पाग) के ऊपर अनारदाना को पट्टीदार सिरपैंच (दोनों ओर मोती की माला से सुसज्जित), पन्ना की लूम, मोरपंख की सादी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में माणक के चार कर्णफूल धराये जाते हैं. श्रीकंठ में टोडर धराया जाता है. हांस, कड़ा, हस्त सांखला आदि सर्व श्रृंगार धराये जाते हैं.

श्वेत पुष्पों की रंग-बिरंगी थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. पीठिका के ऊपर स्वर्ण का हीरा जड़ित चौखटा धराया जाता है.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, पन्ना के वेणुजी एवं दो वेत्रजी (माणक व पन्ना के) धराये जाते हैं.
पट हरा, गोटी शतरंज की सोने की व आरसी लाल मखमल की आती है.

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शयन समय मणिकोठा में हांडी में रौशनी की जाती है, दीपक का पाट साजा जाता है और रंगोली मांडी जाती है. निज मन्दिर में रौशनी का झाड़ आता है.
डोलतिबारी में आज से रौशनी नहीं की जाती.

आज से श्रीजी को प्रतिदिन उत्थापन के फल भोग में गन्ना के टूक (छीले हुए गन्ना के टुकड़े) अरोगाये जाने प्रारंभ हो जाते हैं. ये सामग्री प्रतिदिन आगामी डोलोत्सव तक अरोगायी जाती है.

संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के श्रृंगार बड़ेकर छोटे (छेडान के) श्रृंगार धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर लूम, तुर्रा सुनहरी धराये जाते हैं.

शयन समय प्रभु बंगले (हटड़ी) में बिराजते हैं. मनोरथ के रूप में विविध सामग्रियां अरोगायी जाती हैं.

आज शयन उपरांत नाथद्वारा के आसपास के विभिन्न गावों से ग्रामीण लोग अपने खेतों से और श्रीजी के बगीचों से ठाकुरजी को अन्नकूट पर अरोगाने के लिए आज बैलगाड़ियों में भरकर पालक की भाजी लाते हैं. चतुर्दशी के पूरे दिन भाजी की सेवा चलती है.

दशमी से प्रतिदिन शयन के अनोसर में प्रभु को सूखे मेवे और मिश्री से निर्मित मिठाई, खिलौने आदि का थाल आरोगाया जाता है.

इसके अतिरिक्त दशमी से ही अनोसर में प्रभु के सम्मुख इत्रदान व चोपड़ा (इलायची, जायफल, जावित्री, सुपारी और लौंग आदि) भी रखे जाते हैं.

07/11/2020
27/10/2020
व्रज – आश्विन शुक्ल नवमी Sunday, 24 October 2020विजयदशमी, दशहरा                   मंगला दर्शन
24/10/2020

व्रज – आश्विन शुक्ल नवमी
Sunday, 24 October 2020

विजयदशमी, दशहरा

मंगला दर्शन

व्रज – आश्विन शुक्ल षष्ठीThursday, 22 October 2020छठो विलास कियो श्यामा जु गौधन वन चली भामा जु ।पहेरे रंग रंग सारी  हाथन...
22/10/2020

व्रज – आश्विन शुक्ल षष्ठी
Thursday, 22 October 2020

छठो विलास कियो श्यामा जु
गौधन वन चली भामा जु ।
पहेरे रंग रंग सारी हाथन पूजन थारी ।
ताकी मुख्य सहचरी राई खेलनमें बहुत सुधराई ।।१।।
चली बन बन बिहसी सुंदरी हार कंकन जगमगे ।
आई मंदिर पूजन देवी भोग सिखरन सगमगे ।।२।।
ता समे प्रभु पधारे कोटि मन्मथ मोहे ही ।
निरखी सखियन कमल मुख मानो निर्धन धन जो सोहे ।।३।।
खेलको आरंभ कीनो राधा माधो बीच किये ।
वाकी परछाई परी तब रसिक चरनन चित दिये ।।४।।

विशेष - आज छठे विलास का लीला स्थल गोवर्धन वन है. आज के मनोरथ की मुख्य सखी राईजी हैं और सामग्री मोहनथाल एवं दूधपूवा है यद्यपि यह सामग्री श्रीजी में नहीं अरोगायी जाती है परन्तु कई पुष्टिमार्गीय मंदिरों में सेव्य स्वरूपों को अरोगायी जाती है.

आज नित्यलीलास्थ गौस्वामी तिलकायत श्री गोवर्धनलालजी महाराजश्री के बहूजी का उत्सव है जिसे राणीजी का उत्सव भी कहा जाता हैं.

श्रीजी को आज गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से सिकोरी (मूंगदाल, मावे, इलायची के मीठे मसाले से निर्मित पूरणपूड़ी जैसी सामग्री) अरोगायी जाती है.
आज श्रीजी को सखड़ी में पत्तरवेला प्रकार आरोगाया जाता हैं.

श्रीजी में सभी देवों को मान दिया जाता है और महाप्रभुजी ने भी भगवान विष्णु के दस अवतारों में से चार (श्रीकृष्ण, श्रीराम, श्रीवामन एवं श्रीनृसिंह) को मान्यता दी है.
इसी सन्दर्भ में आज श्रीजी में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचन्द्रजी को मान देती आज श्री रामचंद्रजी के जीवन चरित्र का दर्शन कराती पिछवाई धरायी जाती है.
इसी प्रकार रामभक्त हनुमान जी के गुणगान एवं अन्य रामभक्त जानकीजी को खोज रहे हैं ऐसी लीला के कीर्तन संध्या-आरती में मारू राग में गाये जाते हैं.

पायं तो पूजि चले रघुनाथ
हनुमान आदि ले बडरे योद्धा लीने साथ।।
से तू बांधि के लंका लूटी, रावण के काटे माथ।
कृष्ण दास सीता घर लाये, विभीषण कियो सनाथ।।

आज प्रभु श्री रामचन्द्रजी के पराक्रम की भावना को दर्शाता मल्लकाछ-टिपारा का श्रृंगार धराया जाता है.
इस श्रृंगार के विषय में मैं पहले भी कई बार बता चुका हूँ कि मल्लकाछ शब्द दो शब्दों (मल्ल एवं कच्छ) के मेल से बना है. ये एक विशेष परिधान है जो आम तौर पर पहलवान मल्ल (कुश्ती) के समय पहना करते हैं. यह श्रृंगार पराक्रमी प्रभु को वीर-रस की भावना से धराया जाता है.

आज के इस श्रृंगार की विशेषता यह है कि वर्षभर में केवल आज मल्लकाछ के ऊपर चाकदार वागा धराये जाते हैं जो कि विशिष्ट वीर-रस का धोतक है.

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राजभोग दर्शन –

कीर्तन (राग : सारंग)

वृन्दावन सघनकुंज माधुरी लतान तर जमुना पुलिनमे मधुर बाजे बांसुरी l
जबते धुनि सुनी कान मानो लागे मैंनबान, प्राननकी कासौ कहू पीर होत पांसुरी ll 1 ll
व्याप्यो जु अनंग ताते अंग सुधि भूल गई कौऊ वंदो कोऊ निंदो करौ उपहासरी l
ऐसे ‘व्रजाधीश’सों प्रीति नई रीति बाढ़ी जाके उर गढ़ रही प्रेम पुंज गांसरी ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में प्रभु श्री रामचंद्रजी के जन्म से रावण वध एवं उनके राज्याभिषेक तक के विविध प्रसंगों को दर्शाते चित्रांकन वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया और चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज लाल रंग के सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित मल्लकाछ एवं इसी प्रकार गुलाबी रंग के छापा का, रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित चोली एवं चड़ी आस्तीन का खुलेबंध का चाकदार वागा धराया जाता है. आज पटका लाल रंग का एक ही धराया जाता हैं. ठाड़े वस्त्र मेघश्याम रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को मध्य का (घुटने तक) भारी श्रृंगार धराया जाता है. हीरा के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर टिपारा का साज धराया जाता है जिसमें लाल रंग के छापा की टिपारा की टोपी के ऊपर सिरपैंच, मध्य में मोरशिखा, दोनों ओर दोहरा कतरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. बायीं ओर मोती की चोटी (शिखा) धरायी जाती है. श्रीकर्ण में हीरा के कुंडल धराये जाते हैं.
आज चड़ी आस्तीन का बागा धराने से हीरा की एक ही गोल पहुची धराई धराई जाती हैं.
श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, लहरिया के वेणुजी और दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट गुलाबी व गोटी बाघ-बकरी की आती है.

व्रज – आश्विन अधिक कृष्ण एकादशीTuesday, 13 October 2020आज के मनोरथ-🌸राजभोग में गुलाबी घटा संग गुलाबी मख़मल का  बंगला🌸शाम...
13/10/2020

व्रज – आश्विन अधिक कृष्ण एकादशी
Tuesday, 13 October 2020

आज के मनोरथ-

🌸राजभोग में गुलाबी घटा संग गुलाबी मख़मल का बंगला

🌸शाम को गुलाबी गणगौर का मनोरथ

अधिक मास में आज श्रीजी को गुलाबी पिछोड़ा गुलाबी घटावत श्रृंगार धराया जायेगा

फूल गुलाबी साज अति शोभित तापर राजत बालकृष्ण बिहारी ।
फ़ेंटा गुलाबी पिछोरा रह्यो फबि फूल गुलाबी रंग अति भारी ।।१।।
वाम भाग वृषभाननंदनी पहेरे गुलाबी कंचुकी सारी ।
फूल गुलाबी हस्तकमलमें छबि पर कुंभनदास बलिहारी ।।२।।

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राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

आज शृंगार निरख श्यामा को नीको बन्यो श्याम मन भावत ।
यह छबि तनहि लखायो चाहत कर गहि के मुखचंद्र दिखावत ।।१।।
मुख जोरें प्रतिबिम्ब विराजत निरख निरख मन में मुस्कावत ।
चतुर्भुज प्रभु गिरिधर श्री राधा अरस परस दोऊ रीझि रिझावत ।।२।।

साज – श्रीजी में आज गुलाबी मलमल की पिछवाई धरायी जाती है. खंड,पाट,गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर गुलाबी बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज गुलाबी मलमल का पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र गुलाबी रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. गुलाबी मीना के सर्व आभरण धराये जाते हैं. मीना की हमेल धरायी जाती है.
श्रीमस्तक पर गुलाबी रंग की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम, तथा गुलाबी दोहरा कतरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में कर्णफूल धराये जाते हैं.
एक हार एवं पचलड़ा धराया जाता हैं.
गुलाब के पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, गुलाबी मीना के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट गुलाबी और गोटी चांदी की आती हैं.

व्रज – आश्विन अधिक कृष्ण द्वितीयाSaturday, 03 October 2020आज के मनोरथ-🌼राजभोग में यमुना पुलिन पर बंगला🌼शाम को बंगला फूल ...
03/10/2020

व्रज – आश्विन अधिक कृष्ण द्वितीया
Saturday, 03 October 2020

आज के मनोरथ-

🌼राजभोग में यमुना पुलिन पर बंगला

🌼शाम को बंगला फूल के आभरण एवं शयन में चिरहरण का मनोरथ

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : आशावरी)

तेरे लाल मेरो माखन खायो l
भर दुपहरी देखि घर सूनो ढोरि ढंढोरि अबहि घरु आयो ll 1 ll
खोल किंवार पैठी मंदिरमे सब दधि अपने सखनि खवायो l
छीके हौ ते चढ़ी ऊखल पर अनभावत धरनी ढरकायो ll 2 ll
नित्यप्रति हानि कहां लो सहिये ऐ ढोटा जु भले ढंग लायो l
‘नंददास’ प्रभु तुम बरजो हो पूत अनोखो तैं हि जायो ll 3 ll

साज – आज श्रीजी में केसरी रंग की मलमल पर रुपहली ज़री की तुईलैस के हांशिया (किनारी) वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया और चरणचौकी के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज पिले मलमल की धोती एवं राजशाही पटका धराया जाता है. दोनों वस्त्र सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं. ठाड़े वस्त्र लाल रंग के होते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. नीलम के सर्व-आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर पिले रंग की गोल पाग के ऊपर लूम गोल चंद्रिका एवं बायीं शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं.
श्वेत एवं पीले पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, लाल मीना के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट पिला एवं गोटी मीना की आती हैं.

व्रज – आश्विन अधिक शुक्ल प्रतिपदाFriday, 18 September 2020विशेष - आज से पुरशोत्तम (अधिक )  मास शुरू हो रहा हे जो 18 सितं...
18/09/2020

व्रज – आश्विन अधिक शुक्ल प्रतिपदा
Friday, 18 September 2020

विशेष - आज से पुरशोत्तम (अधिक ) मास शुरू हो रहा हे जो 18 सितंबर 2020 से 16 ऑक्टोबर 2020 तक रहेगा. श्रीजी को पूरे अधिक मास में विविध प्रकार के मनोरथ कर के रिझाया जाएगा.
(अधिक मास पर विशेष अन्य पोस्ट में )

आज के मनोरथ-
राजभोग में सायबान की फूलन की मंडली
शाम को मणि कोठा में साँझी को मनोरथ
(सांझी भली बनी आई)

विशेष – आज का श्रृंगार ऐच्छिक है. ऐच्छिक श्रृंगार नियम के श्रृंगार के अलावा अन्य खाली दिनों में ऐच्छिक श्रृंगार धराया जाता है.
ऐच्छिक श्रृंगार प्रभु श्री गोवर्धनधरण की इच्छा, मौसम की अनुकूलता, ऐच्छिक श्रृंगारों की उपलब्धता, पूज्य श्री तिलकायत की आज्ञा एवं मुखिया जी के स्व-विवेक के आधार पर धराया जाता है.

मुझे ज्ञात जानकारी के अनुसार आज श्रीजी को लाल मलमल का पिछोड़ा
श्रीमस्तक पर लाल कुल्हे और पाँच मोर चंद्रिका की जोड़ धरायी जायेगी.

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राजभोग दर्शन -

कीर्तन – (राग : सारंग)

बल बल आज की बानिक लाल l
कसुम्भी पाग पीत कुलह भरित कुसुम गुलाल ll 1 ll
विश्वमोहन नवकेसर को तिलक ललित भाल l
सुन्दर मुख कमल हि लपटावत मधुप जाल ll 2 ll
बरुनी पीत विथुरित बंद सुभग उर विसाल l
‘गोविंद’ प्रभुके पदनख परसत तरुन तुलसीमाल ll 3 ll

साज – आज श्रीजी में लाल रंग की मलमल पर रुपहली ज़री की तुईलैस के हांशिया (किनारी) वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया और चरणचौकी के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज लाल रंग की मलमल पर सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र मेघस्याम रंग के होते हैं.

शृंगार – प्रभु को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. हीरा के सर्व-आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर लाल रंग की कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, पांच मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ और बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. बायीं ओर हीरा की चोटी धरायी जाती है. श्रीकर्ण में हीरा के मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं.
कली, कस्तूरी एवं कमल माला धराई जाती हैं.
पीले एवं श्वेत पुष्पों की रंग-बिरंगी थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, मीना के लहरियाँ के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट लाल एवं गोटी चाँदी की आती हैं.

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देखि सांझी की शोभा आली ।
कुँज महल की पौरि रचाई ,श्याम सहेली घूंघट वाली ।१।
सांची प्रीति की केली साँझी ,मनमोहत सखी नई निराली ।
गावत मधुर गीत प्रीती के ,नृत्य संगीत संच सुर ताली ।२।
सजि धजि संग पूंजियै प्यारी,साजी सुरति सौंज की थाली ।
मनभायौ चाह्यौ सब पावौ,सुनि सिंगारि सजि हुलसत चाली ।३।
सांझी सुरति सेज सुख अद्भुत ,श्याम सहेली प्रीती पाली ।
कृष्णचंद्र राधा चरणदासि बलि ,पूंजत मिलीं मीत बनमाली ।४।

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11/09/2020

– आश्विन कृष्ण नवमी
Friday, 11 September 2020

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