06/05/2026
ग़ज़ल इश्क की राह में मंज़िल मिले, ये ज़रूरी तो नहीं,हर अधूरी दास्ताँ में कोई कमी हो, ये ज़रूरी तो नहीं।किसी ने स्याही से कागज़ पर अपना दर्द लिख डाला,हर आशिक की आँखों में नमी हो, ये ज़रूरी तो नहीं।मुमताज़ की नज़ाकत थी कि बोझ फूलों का न उठा सकी,पर पत्थर भी वफ़ा की गवाही दें, ये ज़रूरी तो नहीं।शाहजहाँ ने तो बना दी प्यार की मूरत संग-ए-मरमर से,हर घर में ताजमहल की ज़मीं हो, ये ज़रूरी तो नहीं।कोई मरकर भी अमर है अपनी मोहब्बत के सदके,ज़िंदा रहकर ही मोहब्बत रूहानी हो, ये ज़रूरी तो नहीं।
Good night 🌉🌉🌉😴💤💤
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sahuan ji